आपका इस ब्लॉग पर आने के धन्यवाद आज के ब्लॉग में हम कक्षा 6th की इतिहास की NCERT की पुस्तक के अध्याय 10 (नए साम्राज्य राज्य) के बारे में पढ़ें...
आपका इस ब्लॉग पर आने के धन्यवाद आज के ब्लॉग में हम कक्षा 6th की इतिहास की NCERT की पुस्तक के अध्याय 10 (नए साम्राज्य राज्य) के बारे में पढ़ेंगे। .......
प्रशस्तियाँ - किसी की प्रसंशा में लिखी कविता या बातो को प्रशस्तियाँ कहते है।
- प्रशस्तियाँ लिखने का प्रचलन काफी पहले से है परन्तु गुप्तकाल के दौरान इसका प्रचलन बहुत बढ़ गया था।
- करीब 1700 वर्ष पहले समुन्द्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण ने संस्कृत भाषा में कविता लिखी जिसकी इलाहाबद में अशोक लौह स्तंभ पर इसकी खुदाई भी की गई थी।
- इसको समुन्द्रगुप्त की प्रशस्ति भी कहा जाता है।
समुन्द्रगुप्त की प्रशस्ति
- कवि ने इस प्रशस्ति में राजा की एक योद्धा , युद्ध जीतने वाला राजा , विद्वान और उत्कृष्ट कवि के रूप में प्रशंसा की है। इसमें समुद्रगुप्त को हरिषेण ने ईश्वर के समान बताया है।
हरिषेण ने चार विभिन्न प्रकार के राजाओ और उनके प्रति समुन्द्रगुप्त की नीतियों का वर्णन किया है -
(1) समुन्द्रगुप्त ने आर्यव्रत के 9 शासको का राज्य उनको हराकर अपने राज्य में मिलाया।
(2) दक्षिणापथ के बहार के शासको को हराकर उनको दोबारा वहा शासन की अनुमति दी।
(3) असम , तटीय बंगाल , नेपाल और उत्तर पच्छिम के कई गण राजा समुन्द्रगुप्त को उपहार देते और उनकी आज्ञा का पालन करते थे।
(4) उत्तर पच्छिम में कुषाण और शक वंश और श्रीलंका ने भी समुन्द्र गुप्त की अधीनता स्वीकार की थी और अपनी पुत्रियों के विवाह इस शासक से कराये थे।
वंशावली
- अधिकांश प्रसस्तियाँ शासको के पूर्वजो के बारे में भी बताती है इस प्रसस्ति में भी समुन्द्रगुप्त के प्रतिपामह , पितामह (दादाजी), पिता जी , माता जी के बारे में भी पता चलता है।
- समुन्द्रगुप्त की माता लिछवि गण से थी और उनके पिता चन्द्रगुप्त (महाराजाधिराज की उपाधि धारण करने वाले पहले गुप्त शासक ) थे।
- चन्द्रगुप्त के बाद समुन्द्रगुप्त ने भी महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी।
- चंद्रगुप्त तृतीय (समुन्द्रगुप्त पुत्र) ने पच्छिम भारत में सैन्य अभियान करके शक के अंतिम शासक को पराजित किया था।
- कवि कालिदास और खगोल शास्त्री आर्यभट चंद्रगुप्त तृतीय के दरबारी थे।
हर्षवर्धन और हर्षचरित
- हर्षवर्धन जो करीब 1400 वर्ष पहले के राजा थे उनके दरबार में कवि बाणभट रहते थे जिन्होंने उनकी जीवनी हर्षचरित की रचना संस्कृत में की थी।
- चीनी बौद्ध यात्री श्वेन - तत्सांग काफी समय तक हर्ष के दरबार में रहे।
- अपने पिता और बड़े भाई की मृत्यु के बाद हर्ष थानेसर के राजा बने और उस समय उनके बहनोई (ग्रहबर्मा ) कन्नौज के राजा थे।
- उनके बहनोई की हत्या बंगाल के शासक दी तो हरह ने कन्नौज को अपने अधीन कर बंगाल पर आक्रमण कर दिया था।
- जब उन्होंने दक्कन पर आक्रमण क्र उसको अधीन करना चाहा चालुक्य वंश के राजा पुलकेशिन द्वितीय ने उनकी हत्या कर दी थी।
पल्लव , चालुक्य और पुलकेशिन द्वितीय की प्रशस्तियाँ
- इस समय दक्षिण भारत में पल्लव और चालुक्य भी महत्वपूर्ण राजवंश थे।
- पल्लवों काविस्तार कांचीपुरम के आस पास के क्षेत्रों से लेकर कावेरी नदी के डेल्टा तक फैला था।
- चालुक्य का विस्तार दक्षिण में कृष्णा नदी और तुंगभद्रा नदी के बीच में तक था।
- चालुक्य की राजधानी ऐहोल थी जो एक व्यापारिक और केंद्र भी था।
- पुलकेशिन द्वितीय की जानकारी कवि रविकीर्ति द्वारा रचित उनकी प्रशस्तियो से प्राप्त होती है।
- अंत में पल्लव और चालुक्य दोनों ही वंश कमजोर पड़ गए और इसका फायदा राष्ट्रकूट और चोल वंश ने उठाया।
इन राज्यों का प्रशासन
- प्रशासन की प्राथमिक इकाई गांव होती थी बाद में बहुत से बदलाव होने लगे थे जिस कारण राजाओ की आर्थिक , सामाजिक , राजनीतिक , सैन्य शक्तियां बढ़ने लगी थी।
(1) राज्य में कुछ पद पर सिर्फ अनुवांशिक (परिवारिक सदस्य) थे।
(2) स्थानीय प्रशासन पर बोलबाला होता था जैसे - शहर का व्यापारी , मुख्य बेंकर आदि।
- बाद में इन महत्वपूर्ण लोगो में कुछ व्यक्ति इतने शक्तिशाली होते गए कि खुद को स्वंतंत्र घोषित कर खुद राज्य पर शासन करने लगे।
- उस काल में सामंत(राजा अधीन किसी राज्य पर शासन ) प्रथा भी थी।
- सामंतो का कार्य होता था अपने क्षेत्र से कर वसूलना ,
- कभी कभी जब शासक दुर्बल हो जाता था तो सामंत खुद को स्वंतंत्र घोषित कर राजा मान लेते थे।
दक्षिण के राज्यों में सभाए
- पल्लवों के अभिलेख से कई स्थानीय सभाओ की जानकारी मिलती। है
- ब्राह्मण भूमि सभाओ का संगठन को सभा कहते थे।
- व्यापारियों के संगठन को नागरम कहा जाता था।
- कालिदास की रचना - अभिज्ञान शाकुंतलम जिसमे राजा दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी का वर्णन है।
- लगभग 1400 वर्ष पहले ही पैग़म्बर धर्म की शुरुआत कर दी थी।
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